Archive for July, 2014


mass grave . . . are they grass tears, this dew

mass grave . . .
are they grass tears,
this dew?

©2014 dalvir gill

Advertisements

balu - Copy (2)

Balram Bodhi सहमत हूँ दलवीर| इतिहास के विकास पर मैं भी सवाल उठता हूँ ;
गुजरात की घटनायों पर लिखा मेरा नाटक असल में इसी समझ को चुनौती देता था की इतिहास के साथ विकास सीधे जुडा हुआ है!

नाटक के दोनों नायक गनी खान और नबी खान तीन सदीयों बाद यह देखने भारत आते हैं की औरंगजेब के बाद का भारत कहाँ पहुंचा है, तो वो बड़ी-बड़ी इमारतें, बसें गाडीयें देख कर चकरा जाते हैं|
लेकिन जैसे ही वो दंगों में फंसते हैं तो उन्हें पता चलता है कि आदमी में तो कुछ भी नहीं बदला–सिर्फ ईंट-पत्थर और पहियों के जुड़ने के तरीके बदले हैं|
वो फैसला करते हैं की उन्हें वहाँ ही जाना होगा जहां कश्मीर के पंडित गए थे। आखिरकार गुरू ने उनसे वादा किया था कि उनका खालसा उनकी हिफ़ाज़्त करेगा
लेकिन यह क्या, वो तो देख्ते है कि पँथ के दावेदार तो समय के औरँगज़ेबों से मिले हुए हैं, उनसे मिल कर उन को मारने की फ़िराक में हैं, तो वो चोगा उतार कर अतीत में लौट जाते हैं, यह पुकारते हुए कि

हर तरफ़ औरँगज़ेब हैं, लेकिन खालसा कहाँ है?।

लेकिन इस कथा का सूत्रधार इतना सौभाग्यशाली नहीं है, वो भी राम-नवमी पर राम ढूँढने चला था लेकिन उसे हर तरफ़ रावण(शोर से भरे हुआ) ही रावण मिलते हैं< पर्न्तु वह किसी अतीत में छिप नहीं सकता, क्योंकि उसकी देह महज़ चोगा नहीं है, जिसे वो उतार दे और छिप जाऎ! लो मैनें पूरा पाठ सुना दिया।
जय हो!!!!


balu - CopyBalram Bodhi

दलवीर तुम जानते हो मैं कोई तुमसे छोटा नालायक नहीं हूँ…..हां हां हां…..मजा आ गया,….वैसे, उस नाटक की स्क्रिप्ट मेरे पास है नहीं, सैमुय्ल के पास थी, उसने संभाली नहीं, अब मेरा क्या दोष, पहले लिखूं फिर संभालूं ……अरे यह तो व्ही बात हुई की मरूं भी मैं और रोयूं भी मैं…………..हा हा हा हा………..फिर से मज़ा आया| अब नाराज़ मत होना यार, तुम्हारी नाराजगी नुझे अच्छी नहीं लगती, मैनें उस नाटक के बारे में तुमसे बात ही इस लिए की थी की मेरा मन कहता था कि कुछ निशाँ बच जाएँ| नाटक का नाम था, “तैं की दर्द ना आया”; उस नाटक में एक और सीन था, अष्टमी पर होने वाले कंजक पूजन का………..; गलीयों में निरीह देवियों से जबर-जिनाह करने के बाद हिंदुत्व के गाजी घर लौट कर चोटी बच्ची की कंजक रूप में पूजा करते हैं, उस बच्ची नें उन्हें खिड़की से गलीयों में धधियाते देखा है, अब वो उसकी पूजा कर रहे हैं, बच्ची सिमटती जा रही है, दुर्गा स्त्रोत पीछे से गूँज रहा है, धुन लास्य नहीं बल्कि ताण्डवी है, अब पूजा करके वो लोग चले जाते हैं, बच्ची बेहोश हो कर गिर जाती है, वो मुड़ कर नहीं देखते, अब पता नहीं यह पूजा थी या क्या था| दूसरी तरफ दंगों में मरे लोग फिर से उठते हैं तो उनके जिस्मों से हथियार उग रहे होते हैं|


What wind brought this gentle
white nameless flower before
the railway station ?

— Dimitar Anakiev

HMC, 09/07/2012


.

animated conversations
a lone mind
doing dishes


.jas

golden sunshine
on screamingly green tree –
how bleak the shade

 

 


mass grave . . .
are these tears of grass?
this dew!


 

cloudless sky
reflected in wave-less pond;
meditation

that i just scratched is nothing, just clever wording, soothing to “some ears” -a mild short poem, at the best; but, ( your )

the sky
tousles in the pond . . .
a lotus

is a really nice hokku!
do you catch my drift?

the jump from first two lines to the third ( a lotus ) is which brings in the “Dreaming-Room”, creates the Ma. There’s Yugen ( mystery & depth ) in it. solving the mystery is what we call “participation by the reader”, something a must in hokku – preached, but not practiced.

Now, Every reader will interpret it differently based on his/her sociology-geographical and/or cultural background, on one’s own personal intellectual/existential experience, adding layers to this hokku – its forte.

Whereas, a “description” of a moment/images blandly juxtaposed on doesn’t leave anything for a reader, it doesn’t let the reader to enter into the poem and hence doesn’t encourage him to interpret, to re-interpret it – over and over.

A “small nature-poem” describing “a snap-shot of nature in a moment” even if written while following all the so-called “rules of haiku-writing” is fated to only ONE interpretation, no matter who reads it;
but, a hokku on the other hand will not only be interpreted by each reader differently, but also, the same reader will interpret it differently at different times, in different states of mind. Only because of one reason and that’s Ma, created by “kire” ( the act of cutting ), it not only lets the reader enter into the poem but welcomes him/her.


.

SO WHAT???

cloudless sky
reflected in wave-less pond;
meditation

one can write 50 like this one i just did, in a day. nice thought, but is it hokku?!
and then, on a second thought, the ilks of these are still better than the ones being written on this and/or other pages/sites where a mechanical approach is applied that of “kigo – jux of two images – other paraphernalia”
without any sense of what kigo is and without understanding that jux should create mystery providing depth to the poem forming multiple layers.

blooming acacia . . .
squirrels taking turns, going
up and down

acacia flowers in a particular season – so kigo. and the frolicking of squirrels is jux’ed with the blooming acacia. what a joke! or in Sodhi Parminders words, “So What!!!”
a comment on Sarbjit Singh‘s

the sky
tousles in the pond . . .
a lotus

[ this brings me to my next question is this a Haibun ( = over-simplified as verse+haiku) ]


tadpoles

Tadpoles – Punjabi

ਝਰਨਾ ਝਾਕੇ
ਪੁੱਲ ਉੱਤੋਂ ਦੀ ਹੋ ਕੇ . . .
ਡੱਡ-ਪੂੰਗ

falls loom
over the bridge . . .
tadpoles


ਚੰਨ ਚਮਕੇ ਸਿਖਰ . . .

ਕੰਮੀਆਂ ਦੇ ਵੇਹੜਿਓਂ
ਲੰਘਦਾ

– ਯੋਸਾ ਬੂਸੋਂ
ਪੰ. ਅਨੁ.: ਦਲਵੀਰ ਗਿੱਲ
Yosa Buson

The moon shines at the zenith.
I pass poor quarters.

Moon in the sky’s top,
clearly passes through
this poor town street


ਪੇਂਡੂਲੰਮ –
ਕਰ ਆਪਨੇ ਦੀਪਕ
ਖੂਹ ਮੇਂ ਪੜੇ ਧੜੰਮ


jod'rHi

ਅਕਾਲ-ਨਿਰੂਪ ਵਿੱਚ ਕਾਲ ਆ
ਘੁੱਪ ਹਨੇਰ ਨਿਗਲਿਆ ਚਾਨਣ ਹੁਣ ਕਲਾ ਧਾਰ

ਨਤਮਸਤ ਮਤਸਯ ਪ੍ਰਗਟਾਉ ਸਤਯ
ਲੈ ਸਪਤ-ਰੂਹ ਜੜ੍ਹੀ-ਬੀਜ ਸਬੂੰਹ ਕਰਵਾਉ ਪਾਰ

ਕਰੀਮ ਕੂਰਮ੍ਯ ਆਧਾਰਿਦਾਨ ਦੇ
ਸੁਰੋਸੁਰ ਤਿਆਰ ਮੰਥੈ ਮਾਰੋ ਮਾਰ ਅਵਸੰਨ ਮੰਦਾਰ

ਪਤਨ ਪ੍ਰਿਥਵਿ ਅਥਾਹ ਕਿਥੁ ਵਲ ਵਰਾਹੁ
ਹੇ ਨੀਲਾਕਾਰੁ ਤੇਰੋ ਦੋਏ ਦਾੜ੍ਹ ਲੈ ਪਕੜ੍ਹ ਉਬਾਰ

ਅਵਾਕ ਭਗਤ ਖੜ੍ਹਾ ਵੈਰੀ ਚਤੁਰ ਬੜਾ
ਦੇ ਨਖਿ ਲਿਸ਼ਕਾਰ ਹੇ ਸਿੰਘ-ਪੁਰਸ਼ੋਤਮ ਬੁਲਾਉ ਇਹਨੂੰ ਪਾਰ

ਹੋਇਆ ਚਪਟ ਬ੍ਰਹਮਾਂਡ ਤ੍ਰੇਤੇ ਕਲਿ-ਕਾਂਡ
ਮਹਾਂਬਲਿ ਅਹੰਕਾਰ ਗੁੰਗ ਸ਼ੁਕ੍ਰਚਾਰ ਢਾਈ ਡਿੰਘ ਮਾਰ

ਛਤ੍ਰੀ ਮਲਿ ਭਖੈ ਭਾਖਾ ਮਲੇਸ਼ ਕਥੈ
ਪਰਸ਼ੁ ਤੇਰੇ ਹੱਥ ਹਿੱਤ ਪਰਸੁਆਰਥ ਹੁਣ ਕਰ ਪ੍ਰਹਾਰ

ਰਮਿ ਰਮੈ ਰਾਮੁ ਸਭ ਠਉਰ ਗਾਂਵ
ਹੂਆ ਜਗਮਾਤਿਹਾਰ ਹੋ ਸਿੰਧ ਪਾਰ ਅਸੁਰ ਨਾਭਿ ਪਾੜੁ

ਉੱਜੜੇ ਵੱਗ ਜਾਣ ਫਿਰਿ ਛੇੜੁ ਤਾਣੁ
ਵਾਸੁ-ਕੁਟੁੰਬ ਫਟੇ ਦੇਖ ਕੰਸ ਹਸੈ ਵਿਰਾਟਿ ਫਿਰਿ ਵਿਸ੍ਵਰੂਪ ਧਾਰੁ

ਗੂੰਜੈ ਗੋਬਿੰਦਿਗੀਤ ਅਨਾਹਦ ਸਰਬਮੀਤ
ਸੱਤੂ-ਭੇਟੁ ਹੋ ਮਥੁਰਾਪਤਿ ਗੋਪਿ ਪਰਮਾਗਤਿ ਰਾਧੈ ਗਲਿ ਪੁਸ਼ਪਹਾਰੁ

ਹੇ ਅਰਥ-ਸਿੱਧ ਕਰੂੰ ਬਿਨਤਿ ਕਿਹ ਬਿਧ
ਮੈਂ ਦੂਈ ਜੋਹਾਂ ਫਿਰਿ ਇਕੁ ਹੋਹਾਂ ਜਾਣਿ ਆਤਮਿ-ਸਾਰੁ

ਹੇ ਜਗਤਨਾਥ ਹੇ ਪ੍ਰਾਣਾਧਾਰ
ਤਮਸ ਗੰਭੀਰ ਤੇਰਾ ਭਵੰ-ਖਿਣ ਆ ਕਰ ਸੰਘਾਰ

– ਦਲਵੀਰ ਗਿੱਲ

Photo: Jagdeep Singh Faridkot


1 copy

 

History Is The Autobiography of Time …
ਇਤਿਹਾਸ ਸਮੇਂ ਦੀ ਆਤਮਕਥਾ ਦਾ ਨਾਂ ਹੈ।
इतिहास समय की आत्मकथा का नाम है।