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balu - CopyBalram Bodhi

दलवीर तुम जानते हो मैं कोई तुमसे छोटा नालायक नहीं हूँ…..हां हां हां…..मजा आ गया,….वैसे, उस नाटक की स्क्रिप्ट मेरे पास है नहीं, सैमुय्ल के पास थी, उसने संभाली नहीं, अब मेरा क्या दोष, पहले लिखूं फिर संभालूं ……अरे यह तो व्ही बात हुई की मरूं भी मैं और रोयूं भी मैं…………..हा हा हा हा………..फिर से मज़ा आया| अब नाराज़ मत होना यार, तुम्हारी नाराजगी नुझे अच्छी नहीं लगती, मैनें उस नाटक के बारे में तुमसे बात ही इस लिए की थी की मेरा मन कहता था कि कुछ निशाँ बच जाएँ| नाटक का नाम था, “तैं की दर्द ना आया”; उस नाटक में एक और सीन था, अष्टमी पर होने वाले कंजक पूजन का………..; गलीयों में निरीह देवियों से जबर-जिनाह करने के बाद हिंदुत्व के गाजी घर लौट कर चोटी बच्ची की कंजक रूप में पूजा करते हैं, उस बच्ची नें उन्हें खिड़की से गलीयों में धधियाते देखा है, अब वो उसकी पूजा कर रहे हैं, बच्ची सिमटती जा रही है, दुर्गा स्त्रोत पीछे से गूँज रहा है, धुन लास्य नहीं बल्कि ताण्डवी है, अब पूजा करके वो लोग चले जाते हैं, बच्ची बेहोश हो कर गिर जाती है, वो मुड़ कर नहीं देखते, अब पता नहीं यह पूजा थी या क्या था| दूसरी तरफ दंगों में मरे लोग फिर से उठते हैं तो उनके जिस्मों से हथियार उग रहे होते हैं|

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